Homeकथाएँभरत ने अयोध्या के राज को क्यों ठुकरा दिया

भरत ने अयोध्या के राज को क्यों ठुकरा दिया

नमस्कार प्रिय मित्रों जय श्री राम आज के इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि भरत ने अयोध्या के राज को क्यों ठुकरा दिया मित्रों इस कथा के बारे में हम आपको विस्तारपूर्वक बताएंगे और यह भी बताएंगे कि भरत की माता केकई ने किसके कहने पर अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाने का निर्णय लिया

प्रिय मित्रों आप रामायण के बारे में तो जानते ही होंगे रामायण में श्री रामचंद्र उनके छोटे भ्राता लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न इन 4 महान किरदारों के बारे में तो रामायण में बहुत सी कथाएं कहीं गई है उनमें से ही एक कथा आज हम आपको बताएंगे जिसमें भारत ने अपने बड़े भाई श्रीराम के लिए क्यों राज सिंहासन को त्याग दिया और एक वनवासी की तरह महल में रहने लगे

दोस्तों यह घटना तब की है जब श्री रामचंद्र को 14 वर्षों के वनवास के लिए भेज दिया गया था जब श्री रामचंद्र को वनवास के लिए भेजा गया था तब भरत अपने ननिहाल गए हुए थे अगर भरत अयोध्या में होते तो वह शायद ही श्री रामचंद्र को वनवास के लिए जाने देते परंतु उनकी माता को इस बारे में पता था इसलिए उन्होंने पहले ही भरत को ननिहाल भेज दिया था

उसके बाद में उनकी माता केकई ने भरत के पिता दशरथ से अपने दो वचन पूरे करने के लिए कहा भरत की माता केकई ने दशरथ से पहले वचन में कहा कि वह श्री रामचंद्र को वनवास भेज दे 14 वर्षों के लिए और दूसरे वचन में उन्होंने दशरथ जी से मांगा कि वह भरत को अयोध्या की राजगद्दी दे दे

जब भारत को यह पता चला कि भगवान श्री रामचंद्र को वनवास हो गया है तब वह बड़े दुखी हुए और वह अपनी माता से ऐसे वचन मांगने पर प्रश्न करने के लिए उनके कक्ष में गए और उन्होंने अपनी माता से कहा कि हे माता आप कैसी माता हो जो कि अपने ही पुत्रों के कलंक का कारण बनी हो

और वह क्रोधित होते हुए अपनी माता को कहते हैं कि आज से मैं आपको अपनी माता नहीं मानता और उन्होंने अपनी माता को कहा कि जिस राज सिंहासन के लिए आपने मेरे प्राण प्रिय भ्राता को वनवास के लिए भेजा मैं आज से उस राज सिंहासन का त्याग करता हूं और महल में ही वनवासी की तरह रहूंगा जब तक श्री रामचंद्र अपना वनवास पूरा करके वापस महल में ना आ जाए और राज सिंहासन ना ग्रहण कर ले

दोस्तों भारत ने राज सिंहासन को इसलिए त्यागा क्योंकि वह अपने बड़े भाई से बड़ा प्रेम करते थे उनमें सत्ता का लालच नहीं था वह तो अपने बड़े भाई के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर सकते थे परंतु अपनी माता के कारण उन्हें ऐसे दिन देखने को मिले पर फिर भी जब तक श्री रामचंद्र वनवास में थे भारत अपने महल में रहते हुए भी वनवासी की तरह रहते थे

वह महल के व्यंजनों पकवानों का सेवन न करके कंदमूल फल खाकर ही अपना समय व्यतीत करते थे और हर समय अपने बड़े भाई श्री राम का चिंतन करते रहते थे रात्रि को घास पर ही सोते थे इस तरह के त्याग की भावना और अपने बड़े भाई के प्रति प्रेम को लेकर ही भारत ने राज सिंहासन को स्वीकार नहीं किया

मित्रों आशा करता हूं कि आपको हमारी आज की यह कथा पसंद आई होगी जिसमें हमने आपको बताया कि क्यों भारत ने अयोध्या के राज को ठुकरा दिया मित्रों अगर आपका इस कथा के प्रति कोई प्रश्न है तो आप हमें कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें और अगर आप ऐसी ही और कोई कथा के बारे में हमारे विचार जानना चाहते हैं तो वह भी आप हमसे पूछ सकते हैं हम आपके प्रश्न का जरूर जवाब देंगे

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